यीशु कौन है?
यीशु परमेश्वर का मेम्ना है, जो जगत के पाप उठा ले जाता है।
सिद्ध न्याय प्राप्त करने के लिए यीशु को परमेश्वर के सिद्ध बलिदान के रूप में प्रदान किया गया। सब समय के सब पाप के लिए एक ही बलिदान। (यूहन्ना 1:29, इब्रानियों 10:10)
यीशु में विश्वास के द्वारा, परमेश्वर द्वारा हमारे पाप भुला दिए जाते हैं, और हम उसकी धार्मिकता प्राप्त करते हैं। (इफिसियों 2:8, रोमियों 3:22) हम परमेश्वर के सिंहासन के पास आ सकते हैं और उसे अपना पिता कहकर सम्बोधित कर सकते हैं। (मत्ती 6:9, लूका 11:2) यीशु ने इसे सम्भव बनाया। (यूहन्ना 14:6)
बुनियादी तौर से मैं एक अच्छा व्यक्ति हूँ। क्या फिर भी मुझे यीशु की जरूरत है?
पाप का अर्थ है "लक्ष्य से चूकना", सिद्ध न्याय में कमी रह जाना। पाप इरादतन अथवा अनजाने में हो सकता है। आपके साथ जो गलत किया गया, और पाप के रूप में दूसरों के साथ आपने जो गलत किया उस पर ध्यान दें। अति उत्तम इरादों के साथ भी हम लक्ष्य से चूक गए हैं। (रोमियों 3:23)(रोमियों 6:23)
जिस प्रकार के जीवन हमने जीए, उसकी परवाह किए बिना, जीवन के लिए परमेश्वर का वरदान सबके लिए प्रस्तुत किया गया है। उसके पुत्र के बलिदान के द्वारा परमेश्वर के साथ हमारे सम्बन्ध को पुन: जोड़ा गया है। जब हम यह स्वीकार करते हैं कि यीशु हमारे पापों के लिए मरा, और मृतकों में से जीवित हुआ, तब हम परमेश्वर की सन्तान बन जाते हैं। (गलातियों 3:26)(रोमियों 10:9)
हमारे भले कार्य परमेश्वर को हमसे अधिक प्रेम करने योग्य नहीं बनाते, और ना ही हमारे पाप परमेश्वर को हमसे कम प्रेम करने योग्य बनाते हैं। जबकि हम पापी ही थे तभी मसीह हमारे लिये मरा, इस प्रकार परमेश्वर ने हमारे प्रति अपना प्रेम दिखाया। (रोमियों 5:8) यदि परमेश्वर ने अपने पुत्र को रोके नहीं रखा, जबकि हम पापी ही थे, तब वह हमसे उसके सन्तान होने के नाते वह हमसे क्या कुछ न रख छोड़ेगा?
जब आपके जीवन में सब कुछ गड़बड़ हो जाता हैं, और आप स्वयं को अयोग्य समझने लगते हैं, तब दबाव में न आएँ। हम सब ही अयोग्य हैं, फिर भी, परमेश्वर हमसे प्रेम करता है। (रोमियों 3:23)(1 तीमुथियुस 1:15)
बदले जीवनों के प्रमाण स्वरूप हमारे जीवनों को भले काम उत्पन्न करना चाहिए, परन्तु परमेश्वर के सामने हमारे भले काम हमें धर्मी नहीं ठहराते। (इफिसियों 2:8)(मत्ती 15:4)(मत्ती 5:16) यह सब यीशु के बारे में हैं।
परमेश्वर पापियों से घृणा नहीं करता। उसका हृदय लोगों के लिए है। उसकी इच्छा है कि हम पश्चाताप करें, उसकी ओर मुडें, और उसके जीवन का वरदान प्राप्त करें। (लूका 5:32)(रोमियों 5:8)(लूका 15:10)
यीशु को क्यों "मसीह" कहा गया?
अभी ही विश्वास के द्वारा प्रार्थना करने से आप मसीह को स्वीकार कर सकते हैं:
(प्रार्थना परमेश्वर से बात करना है)
परमेश्वर आपके हृदय को जानता है इसलिए वह आपके द्वारा बोले जानेवाले शब्दों के प्रति नहीं पर आपके हृदय की मनोवृत्ति पर ध्यान देता है। एक सुझाई गई प्रार्थना इस प्रकार है:
"प्रभु यीशु, मुझे आपकी आवश्यकता है। मेरे पापों के लिए क्रूस पर मरने के लिए मैं आपको धन्यवाद देता/देती हूँ। मैं अपने जीवन का द्वार खोलता/खोलती हूँ और आपको अपना उद्धारकर्ता और प्रभु ग्रहण करता/करती हूँ। मेरे पापों को क्षमा करने और मुझे अनन्त जीवन देने के लिए आपका धन्यवाद। मेरे जीवन के सिंहासन का नियंत्रण अपने हाथों में लें। आप मुझे वैसा व्यक्ति बनाएँ जैसा कि आप चाहते हैं कि मैं बनूँ।"
क्या यह प्रार्थना आपके हृदय की इच्छा को व्यक्त करती है? यदि यह करती है, तो मैं आपको निमंत्रण देता हूँ कि ठीक अभी ही इस प्रार्थना को कीजिए और यीशु मसीह आपके जीवन में आएगा, जैसी कि उसने प्रतिज्ञा की है।
यीशु की फिल्म
